मिसाइल तकनीक हासिल करने में पूरी दुनिया से छुपाकर किसने की गुपचुप उत्तर कोरिया की मदद?

प्योंगयांग
4 जुलाई को किए गए अपने ताजा मिसाइल परीक्षण से करीब 4 महीने पहले उत्तर कोरिया ने दुनिया के सामने अपनी ताजातरीन मिसाइल इंजन क्षमता का नजारा पेश किया। कहा जा रहा है कि यह मिसाइल तकनीक इतनी मजबूत और विकसित है कि अमेरिकी शहरों को निशाना बना सकती है। नॉर्थ कोरिया के सरकारी टीवी पर जब इस मिसाइल इंजन को दिखाया गया, तो कई अमेरिकी विशेषज्ञ सोवियत रूस से इसकी समानता को देखकर हैरान रह गए। इसके बारे में एक हथियार विशेषज्ञ माइकल ऐलमैन की जुबानी सुनिए, ‘मैं चौंक गया। उत्तर कोरिया ने मार्च में किए गए अपने मिसाइल परीक्षण में जिस इंजन का इस्तेमाल किया, वह उन इंजनों से काफी मिलता-जुलता है जिसे मैं शीतयुद्ध के आखिरी दौर में रूस के अंदर देखा करता था।’ मालूम हो कि 2 दशक पहले जब रूस और यूक्रेन में सोवियत काल के मिसाइलों को खत्म किया जा रहा था, तब ऐलमैन इस पूरी कार्रवाई का निरीक्षण कर रहे थे।

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उत्तर कोरिया के मिसाइल इंजन पर सोवियत की छाप!
ऐलमैन अमेरिकी रक्षा विभाग के मुख्यालय पेंटागन के पूर्व सलाहकार रह चुके हैं। उनके अलावा कई अन्य विशेषज्ञों का भी यही कहना है कि उत्तर कोरिया के नए मिसाइल इंजन और RD-250 नाम से प्रचलित 1960 के दौर के सोवियत वर्कहॉर्स में काफी समानताएं हैं। पिछले करीब 2 सालों से अमेरिकी विशेषज्ञों यह सोच-सोचकर परेशान हैं कि इतने सारे आर्थिक प्रतिबंध लगाने और प्योंगयांग को हथियार तकनीक निर्यात करने पर लगाए गए प्रतिबंध के बावजूद उत्तर कोरिया आखिरकार किस तरह अपने परमाणु व मिसाइल कार्यक्रम में इतनी तरक्की हासिल कर पा रहा है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि जरूर कोई देश चुपके से उत्तर कोरिया की मदद कर रहा है। इनमें वे रूसी वैज्ञानिक भी शामिल हैं जिन्होंने सालों पहले उत्तर कोरिया को मिसाइल डिजाइन और इससे जुड़ी अन्य जरूरी जानकारियां दीं। साथ ही, इसमें वे चाइनीज कारोबारी भी शामिल हैं जो कि आधुनिक मिसाइल सिस्टम में इस्तेमाल होने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स सामान उत्तर कोरिया को मुहैया कराते हैं। लेकिन इसके अलावा भी शायद कुछ है, जो बेहद गंभीर है और अबतक दुनिया की नजरों से छुपा है।

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बड़ा सवाल: उत्तर कोरिया के पास और क्या-क्या है?
इससे पहले भी उत्तर कोरिया सोवियत के मिसाइल डिजाइन हासिल करने में कामयाब रहा है, लेकिन अब हाल के दिनों में उसके द्वारा किए गए परीक्षणों ने दुनिया के लिए गंभीर चिंताओं को जन्म दिया है। संभावना है कि मिसाइल तकनीक से जुड़े कुछ राज उत्तर कोरिया को मुहैया कराए गए और यह सब इतने गुपचुप तरीके से हुआ कि आजतक किसी को भी इसके बारे में पुख्ता तौर पर कुछ नहीं पता चला। ऐलमैन कहते हैं, ‘इसका मतलब है कि सोवियत संघ में उत्तर कोरिया की काफी अंदर तक पहुंच थी और हथियार व इससे जुड़ी तकनीकों को खरीदने का उसका नेटवर्क हमारी कल्पना से भी ज्यादा गहरा था।’ ऐलमैन कहते हैं, ‘अगर ऐसा है, तो मेरा पहला सवाल होगा कि उनके पास ICBM के अलावा और क्या-क्या है? उन्होंने और क्या-क्या हासिल किया है?’

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सोवियत के विघटन के बाद रूसी वैज्ञानिकों ने बेची थी मिसाइल तकनीक
15 अक्टूबर 1992 को मॉस्को हवाईअड्डे पर पुलिस ने रूस के करीब 60 मिसाइल वैज्ञानिकों को हिरासत में लिया। उनके साथ उनके परिवार को भी गिरफ्तार किया गया। ये सभी वैज्ञानिक उत्तर कोरिया के लिए रवाना होने वाले थे। पुलिस द्वारा पूछताछ किए जाने पर वैज्ञानिकों ने माना कि उन्हें उत्तर कोरिया के लिए आधुनिक मिसाइल दस्ता तैयार करने का काम सौंपा गया था और इसके लिए उन्हें पैसे मिले थे। सोवियत संघ के विघटन के बाद कुछ सालों तक रूस के हथियार वैज्ञानिकों के पास काम नहीं था। रूस की अर्थव्यवस्था इतनी खराब हो गई थी कि इन वैज्ञानिकों के पास अपने परिवार का पेट भरने के लिए पैसा नहीं था।

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उत्तर कोरिया की परमाणु क्षमता पूरी दुनिया के लिए खतरा
गिरफ्तार किए गए वैज्ञानिकों में से एक ने मीडिया को बताया, ‘हम पैसा कमाकर वापस लौट आना चाहते थे। पैसे के कारण हम यह काम करने को तैयार हुए।’ पुलिस हालांकि इन 60 वैज्ञानिकों को रोकने में तो कामयाब हो गई, लेकिन बड़ी संख्या में कई अन्य वैज्ञानिक उत्तर कोरिया जाने में सफल रहे। वे अपने साथ मिसाइल व परमाणु हथियार निर्माण के सालों का अनुभव, इनके पार्ट्स और ब्लूप्रिंट्स भी ले गए। उसी समय से उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को एक तरह का जीवनदान मिला। उत्तर कोरिया ने पाकिस्तान के वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान से भी परमाणु तकनीक हासिल की थी। रूस का कहना है कि उत्तर कोरिया के मिसाइल कार्यक्रम के पीछे उसका कोई हाथ नहीं है, लेकिन प्योंगयांग के मिसाइल इंजन की सोवियत हथियारों के साथ जो समानता दिख रही है, वह तो सीधे-सीधे रूस की ओर ही अंगुली उठा रही है।

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