ब्रिटेन के कानूनी संगठन ने 100 साल बाद भारतीय बैरिस्टर को फिर किया बहाल

लंदन
भारत की आजादी की पैरवी के कारण ब्रिटेन की अग्रणी लॉ सोसायटी से निकाले जाने के एक सदी से भी अधिक वक्त गुजरने के बाद भारतीय बैरिस्टर और राष्ट्रवादी नेता श्यामजी कृष्ण वर्मा को मरणोपरांत फिर बहाल कर दिया गया है। ‘द टाइम्स’ को लिखे खत के प्रकाशन के बाद वर्मा को बैरिस्टर होने के बावजूद उनके कथित अनुचित बर्ताव के लिए 1909 में लंदन के ‘द ऑनरेबल सोसायटी ऑफ द इनर टेंपल’ से निकाल दिया गया था।

लंदन में अदालत के चार संगठनों में से एक ‘द इनर टेंपल’ ने कहा है, ‘इनर टेंपल की पीठ ने तय किया है कि वर्मा को, इस तथ्य को देखते हुए संगठन के सदस्य के तौर पर फिर से बहाल किया जाता है कि भारत के लिए उन्होंने जो लड़ाई लड़ी, वह बार की सदस्यता के लिए अयोग्यता नहीं थी और आधुनिक मानकों के हिसाब से निष्पक्ष सुनवाई नहीं हुई थी।’

उनकी पुनर्बहाली, संगठन की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आजादी के प्रति कटिबद्धता को रेखांकित करती है जो कि मुक्त सोसायटी की स्थापना के बाद से महत्वपूर्ण बना रहा। बयान में कहा गया, ‘उम्मीद है कि श्यामजी कृष्ण वर्मा की पुनर्बहाली से देश और विदेश में भारतीय समुदाय के साथ जुड़ाव और मजबूत होगा।’ साल 1988 में संगठन ने महात्मा गांधी को भी पुनर्बहाल कर दिया था।

भारत की आजादी के समर्थन में उनकी राजनीतिक गतिविधियों के कारण उन्हें इस सोसायटी से निकाला गया था। विरोध प्रदर्शन करने के कारण 1922 में उन्हें निलंबित कर दिया गया था। ऑक्सफर्ड के बेलिओल कॉलेज में पढ़े वर्मा ने इंग्लैंड में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों के ठिकाने के तौर पर उत्तरी लंदन के हिगगेट में इंडिया हाउस की स्थापना की थी और वह इंडियन होम रूल सोसायटी के संस्थापक थे।

1884 में बार में बुलाए जाने वाले वह पहले भारतीय थे। उन्होंने भारत में ब्रिटिश शासन की आलोचना करते हुए ‘इंडियन सोशियॉलजिस्ट’ पत्रिका में कई आलेख लिखे थे। इस पत्रिका के वह संस्थापक थे। ‘द टाइम्स’ को एक पत्र में इंडिया हाउस में उन लोगों के लिए एक स्मारक निर्माण पर भी जोर दिया था, जिसका उन्होंने भारतीय शहीद के तौर पर जिक्र किया था।

वर्मा का जन्म गुजरात के कच्छ जिले के मांडवी में चार अक्तूबर 1857 को हुआ था, जहां पर उनके नाम पर एक विश्वविद्यालय है। जिनीवा में 30 मार्च 1930 को उनका निधन हुआ।

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