किसानी हो गइल चौपट, जिगिनिया कइसे कटी ए दइबा

बलिया में पीड़ित परिवारों के करुण क्रंदन से सबकी आंखें नम हो जा रही थीं। लोग समझ नहीं पा रहे थे कि महिलाओं को कैसे चुप कराएं। घर में चूल्हे भी नहीं जले। बच्चे भूख से तड़प रहे थे तो बड़े उन्हें समझाने में लगे थे।

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