‘औरत’, ‘ग्रेप्स ऑफ रेथ’ और ‘द गुड अर्थ’

यह आश्चर्य की बात है कि 1939 में भारत में मेहबूब खान ‘औरत’ बना रहे थे, जिसे 1956 में उन्होंने ‘मदर इंडिया’ के नाम से दोबारा बनाया, तब अमेरिका में जॉन स्टीनबैक के उपन्यास से प्रेरित ‘द ग्रेप्स ऑफ रेथ’ और पर्ल एस. बक की ‘द गुड अर्थ’ पर फिल्में बनाई जा रही थीं। जॉन स्टीनबैक तथा पर्ल एस. बक दोनों ही नोबेल पुरस्कार विजेता बने। जहां स्टीनबैक की किताब और फिल्म औद्योगीकरण के कारण जमीन से उखाड़े गए किसानों की व्यथा-कथा है, वहां पर्ल एस. बक की किताब और फिल्म चीन के किसानों की दु:ख की गाथा है। इसके साथ महाजन की ब्याज की चक्की में पिसते भारतीय किसानों की कथा मेहबूब खान की ‘औरत’ थी। इससे संकेत स्पष्ट है कि दुनिया के सभी देशों के किसानों का समान रूप से शोषण हुआ है और औद्योगीकरण एक विराट किसान विरोध के रूप में उभरा है। दरअसल, कृषि भूमि को बिना छुए भी औद्योगीकरण हो सकता था और वर्तमान में भी हो सकता है।  खेती बनाम कारखाना कोई युद्ध नहीं है। ‘ग्रेप्स ऑप रेथ’ का एक दृश्य है कि गांवों से रोजी-रोटी की तलाश में महानगर आए किसानों का पहला विरोध वे किसान करते हैं, जो…

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