नस्लवादी थे महान वैज्ञानिक आइंस्टीन? ट्रैवल डायरी में लिखे थे नस्लभेदी कॉमेंट

लंदन
अल्बर्ट आइंस्टीन की पहचान एक महान वैज्ञानिक के साथ-साथ ऐंटी-रेसिजम कैंपेनर की भी थी यानी एक ऐसा शख्स जो नस्लवाद के विरोध में अभियान चला रहा हो। इस बीच उनकी डायरी से ऐसा लगता है कि महान वैज्ञानिक खुद नस्लवादी थे। आइंस्टीन द्वारा लिखी गई ट्रैवल डायरी की एक सीरीज को पहली बार अंग्रेजी में प्रकाशित किया गया है। डायरी में आइंस्टीन ने चीन के लोगों को “मेहनती, गंदे, कमअक्ल” के तौर पर बताया है।

अक्टूबर 1922 से मार्च 1923 के बीच लिखी गई आइंस्टीन की ट्रैवल डायरी हाल में अंग्रेजी में प्रकाशित हुई है। डायरी में लिखी बातों से पता चलता है कि आइंस्टीन को अनजान लोगों और विदेशियों से एक तरह का डर लगता था और वह विदेशियों को नापसंद करते थे। चीनी लोगों के बारे में उन्होंने एक जगह लिखा है कि चीन के लोग बेंचों पर बैठकर खाना नहीं खाते हैं बल्कि पालथी मारकर बैठते हैं।

इसी तरह श्री लंका (तब सीलोन) के लोगों के बारे में आइंस्टीन ने लिखा है कि वे बहुत ही ज्यादा गंदगी में रहते हैं। उन्होंने लिखा, ‘कम काम करो, जरूरत कम रखो। यही उनके जीवन का साधारण आर्थिक चक्र है।’ भारतीयों के बारे में भी आइंस्टीन के ख्यालात ठीक नहीं थे। उस वक्त तक वह भारत नहीं आए थे लेकिन डायरी में उन्होंने कोलंबो के भारतीय रिक्शा चालकों का जिक्र किया है।

भारतीय रिक्शाचालकों के लिए ‘भिखारी’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए आइंस्टीन ने लिखा है कि ये भिखारी किसी विदेशी को देखते ही झुंड बनाकर घेर लेते हैं और ये अच्छे से जानते हैं कि कैसे किसी विदेशी से तबतक याचना करना है जबतक कि उसका दिल न पसीज जाए। हालांकि आइंस्टीन ने रवींद्र नाथ टैगोर की तारीफ की है। टैगोर के साथ हुए पत्र-व्यवहार में आइंस्टीन ने उन्हें ‘रब्बी’ कहकर संबोधित किया है जो हिब्रू भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ शिक्षक या गुरु है।

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